प्रस्तुत काव्य संग्रह मन के बोल कवि विभोर माथुर द्वारा लिखी है। इस काव्य संग्रह में कुल 33 कविताएं है। सरल शब्दों में लिखी गई ये रचनाएं रोजमर्रा की जिंदगी से प्रेरित है। इन रचनाओं में आपको एक आम आदमी का दर्द दिखाई देगा।

कवि विभोर, के शब्द जिंदगी के मीठे कड़वे अनुभवों बहुतबखूबी से दर्शाते हैं। साथ ही इसमें में राजनीतिक और सामाजिक रचनाएं भी शामिल है। कवि विभोर की कलम से निकली राजनीतिक और सामाजिक रचनाएं तेज, नुकीली, एवं विचारोत्तेजक है। इनमें से कुछ कविताएं फिलॉसफीकल भी है।

कुछ पंक्तियां जो मेरे मन को भा गयी

कविता अणु-वाद मैं कवि कहते हैं

क्योंकि, तुम हो क्या?
इस धरती, संसार, ब्रह्मांड के पार,
एक सूक्ष्म, महीन, नगन्य हमवार ।

कविता सीता बोलीं से

सीता बोलीं, ऐसे महलों-मंदिरों में
मेरा क्या काम
जहां पूजे जाते हों
बस “पत्थर के राम”।

कविता वो जन्नत कहां है?से

बिखरा हूंँ, भ्रमित हूंँ, अंध हूंँ
मैं इस सांसारिक जकड़ में,
न कारवांँ बनता,
और न ही इत्मिनान के सिरे पकड़ में।

ये नामुमकिन है की इस काव्य संग्रह की सिर्फ एक या दो कविताएँ ही पसंद आए, क्योंकि सभी कविताएँ एक अद्भुत अनुभव करातीं है। यदि आप कविताओं के शौकीन है तो इन कविता का आनंद जरूर उठाएं।

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