I penned this letter two weeks ago. Amrita Pritam often whispers to me, I feel. She pushes me to read her work or pen something down just like this one. This happened at 3AM on one of those sleepless nights. I slipped into her loneliness, felt the love she must have felt, that longing and the words tumbled out and on to my KeepNotes. A big thank you to my friend Makrand Sawant (writer, director and a poet) for doing a copy check on this piece.

मेरे जीती, मेरे विश्वास,‌ इमी, मेरे इमरोज़
तुम नहीं आए
मैं इंतजार करती रही
दिन रात
सिर्फ तुम्हारा
तुम नहीं आए
वक्त की उंगली थाम कर मैं चलना सीख गई
अब ना चाय की चुस्की का मज़ा है, ना बारिश की छम छम का, रंग भी फीके पड़ने लगे हैं
मैंने…. मैंने तुम्हारे रंगों की शीशियां तक संभाल कर रखी है
तुम्हारी मेज पर अब भी सब वैसा ही है जैसा तुम छोड़ कर गए थे
मेरे …मेरे एहसास भी वहीं थमे हैं… तुम में … सब तुम में ही आकर विलीन हो जाता है
क्यों जीती, सब तुम में आकर क्यों विलीन हो जाता है?
इमी, जाने से पहले एक बार कह देते कि अब वापसी कब होगी पता नहीं, होगी भी या नहीं, पता नहीं
अगर कहते ना… अगर कहते ना, तो उस वक्त को वही रोक देती
हम दोनों की यादों को मखमल में लपेटकर तुम्हारे ट्रंक में भर देती, उसी तरह जिस तरह मैंने तुम्हारे कपड़े और कुछ सामान भरा था…
प्यार के रंग भी छिड़क देती
और इत्र भी…
शायद उसी की खुशबू से तुम्हें मेरी याद आती और तुम लौट आते
पर तुम नहीं आए
अब दिन नहीं काटा जाता


हरसिंगार के फूल कितने पसंद है मुझे, याद है ना?
लेकिन देखो, उन फूलों की तरह मैं भी मुरझाने लगी हूं
इमी, देख सकते हो तुम?
महसूस कर पाओगे इस दर्द को?
यह क्या सज़ा है, इमी, प्यार भी करो और दर्द भी?
मैं भी क्या सवाल करने लगी
गुलाब कांटों के साथ ही तो उगता है
इमी, अगर कांटे हैं, तो चुभन सह लेंगे ना थोड़ी?
आओ चलो साथ चल कर देखें?
शायद यह सफर आसान हो जाए?
मेरे जीती लौट आओ अब
देर न करो
मैं इंतजार कर रही हूं तुम्हारा
अगर इस बार नहीं आए,
तो शायद हम नहीं मिल पाएंगे फिर कभी…
इस पत्र को पूर्ण विराम नहीं दे रही क्योंकि आशा है मुझे कि तुम जरूर आओगे…

तुम्हारी
जो़रबी

***Copyright in content and pictures belongs to Siddhi Palande, the owner of this blog, and cannot be republished or repurposed without permission from the author. Infringement of any kind will invite strict legal action.***